बीमा की दुनिया में एक ही उत्पाद है जो अपने नाम के साथ पूरा न्याय करता है — टर्म इंश्योरेंस। आप एक छोटा-सा वार्षिक प्रीमियम देते हैं; बदले में कंपनी वादा करती है कि पॉलिसी अवधि में आपके न रहने पर परिवार को एक बड़ी तयशुदा रक़म मिलेगी। अवधि पूरी होने पर कुछ वापस नहीं मिलता — और यही इसकी ख़ूबी है, कमी नहीं।

क्योंकि कंपनी को “रिटर्न” नहीं देना, इसलिए ३०-३५ साल के स्वस्थ व्यक्ति को ₹1 करोड़ का कवर अक्सर रोज़ की एक चाय से कम क़ीमत में मिल जाता है। समस्या सिर्फ़ एक है: यह उत्पाद बिकता कम है, क्योंकि इसमें एजेंट का कमीशन और ग्राहक का लालच — दोनों को कुछ ख़ास नहीं मिलता। इसीलिए इसे ख़ुद समझकर ख़रीदना पड़ता है।

कितना कवर: आय का 15-20 गुना

अँगूठे का नियम: वार्षिक आय का 15 से 20 गुना, जिसमें बक़ाया लोन (होम लोन विशेषकर) और बच्चों की शिक्षा जैसे बड़े भविष्य के ख़र्च जोड़ लें। ₹12 लाख सालाना कमाने वाले के लिए ₹1.5–2 करोड़ का कवर अटपटा नहीं, गणितीय रूप से सही है — यही रक़म निवेश होकर परिवार की मासिक आमदनी की जगह ले सकती है।

अवधि उतनी रखें जितने साल परिवार आप पर आर्थिक रूप से निर्भर रहेगा — आमतौर पर रिटायरमेंट की उम्र यानी 60-65 तक। 85 साल तक का महँगा कवर अक्सर बेकार है: तब तक ज़िम्मेदारियाँ ख़त्म और संपत्ति तैयार होनी चाहिए। बीमा ज़िम्मेदारियों का पुल है, अमरता की योजना नहीं।

ख़रीदते समय पाँच बातें

पहली और सबसे बड़ी: प्रस्ताव फ़ॉर्म में हर सवाल का सच जवाब — धूम्रपान, बीमारी, पुरानी पॉलिसियाँ, ख़तरनाक शौक़ सब कुछ। दावे ख़ारिज होने का सबसे बड़ा कारण छिपाई गई जानकारी है, प्रीमियम बचाने की यह सबसे महँगी तरकीब है। दूसरी: कंपनी का क्लेम सेटलमेंट रिकॉर्ड देखिए — IRDAI हर साल यह आँकड़ा प्रकाशित करता है।

तीसरी: राइडर सोच-समझकर — एक्सीडेंटल डिसेबिलिटी और क्रिटिकल इलनेस राइडर उपयोगी हो सकते हैं, पर “प्रीमियम वापसी” (TROP) वाला विकल्प लगभग हमेशा घाटे का सौदा है; वही अतिरिक्त प्रीमियम SIP में ज़्यादा बनाता है। चौथी: पॉलिसी की जानकारी परिवार को दीजिए — जिस काग़ज़ के बारे में परिवार जानता ही नहीं, वह किसी काम का नहीं। पाँचवीं: नॉमिनी अपडेट रखिए, और शादी/बच्चों जैसे मोड़ों पर कवर की समीक्षा कीजिए।